Sunday, 25 November 2018

द डार्क साइड -1


भारत जहां तीन चीजें बहुत फेमस है गंगा, गांधी और गोरा। गोरा शायद इसलिए क्योंकि गोरों ने यहां काफी समय तक राज किया था , वरना तो हम भारतीयों का रंग गेहुआ कहा जाता है।
फाइल फोटो

गांधी जिन्होंने अपने आंदोलन की शुरुआत ही रंगभेद के खिलाफ खड़े होकर की थी ।उन्हीं का भारत आज भी रंगभेद के दंश से उबर नहीं पाया है। हमारे देश में आज भी महिला के गर्भवती होते ही उसे केसर का दूध या नारियल पानी पीने की मुफ्त सलाह यह कहते हुए दी जाती है कि बच्चा गोरा होगा।

इसमें हमारे सिनेमा का भी बहुत बड़ा रोल रहा है। धूप में निकला ना करो रूप की रानी गोरा रंग काला ना पड़ जाए ,ओ हसीना जुल्फों वाली जाने जहां ,यह झील सी नीली आंखें कोई राज है इनमें गहरा जैसे गाने लोगों की सोच पर प्रहार करते हैं।इस सब के चलते ही लोगों ने गोरे रंग को ही श्रेष्ठ मान लिया है। 

इसेभीपढ़ें http://a8dixitaparna.blogspot.com/2018/09/blog-post.html?m=1

सुंदरता के पैमाने सिर्फ रंग पर ही नहीं ठहरते बल्कि बालों की लंबाई, आइब्रो का पतला या मोटा होना, यहां तक कि होठों के ऊपर कितने बाल होंगे यह भी सुंदरता को तय करता है।
फाइल फोटो

इसका फायदा उठाया बाजार में मौजूद कंपनियों ने और शुरू हुआ कॉस्मेटिक्स का खेल। साल 1919 में आई सबसे पहली फेयरनेस क्रीम अफगान स्नो ,फिर दौर आया फेयर एंड लवली का 1975 ।साल 2005 छुप-छुपकर लड़कियों की फेयरनेस क्रीम लगाने वाले मर्दों के लिए शानदार रहा क्योंकि इसी साल आई फेयर एंड हैंडसम क्रीम खास मर्दों के लिए।

Monday, 19 November 2018

धन्यवाद ...


एक धन्यवाद पुरुषों को,
हां उनको भी जिन्हें लगता है फेमिनिज्म पढ़कर लड़कियों का दिमाग खराब हो गया है ।

उन्हें भी जिन्हें लगता है बराबरी का अधिकार मांगती है लड़कियां तो क्यों बस में खड़ी नहीं रह सकती क्या।

हां खींज तो होती होगी तुम्हें पर यह सदियों से चली आ रही बंदिशे ऐसे ही तो टूटेंगी मेरे दोस्त ।

धन्यवाद उस पिता को जो हर हाल में अपनी बेटी को दुलराता है और हमेशा उसका साथ देता है ।

धन्यवाद उस भाई को जो हर फैसले को मजबूती देते हुए कहता है अरे जाओ मैं संभाल लूंगा ।

हां उस दोस्त को भी जो हर खुशी, हर गम और हर लड़ाई का साथी है ।

एक धन्यवाद बॉयफ्रेंड और पति रूपी पुरुषों को भी।

रोज रोज अखबार में रेप की खबरें पढ़कर सिहरन तो तुम्हें भी होती है और तुम्हें खीज होती है जब कुछ गलत पुरुषों की वजह से तुम्हारी पूरी कौम को गलत ठहराया जाता है, पर यह भी एक सच्चाई है मेरे दोस्त जिसे झूठलाया नहीं जा सकता।

Saturday, 10 November 2018

पुस्तक समीक्षा













नाम :84 चौरासी
मूल्य:₹125
लेखक: सत्य व्यास
पब्लिशर: हिन्द युग्म

यह लेखक का तीसरा उपन्यास है। नए युग के लेखक सत्य व्यास  ने सामान्य भाषा का प्रयोग किया है। यह एक सामान्य पाठक के लिए आसान है।

इसकी शुरुवात मुख्य पात्र मनु और ऋषि की भेंट से होती है। फिर प्रधानमंत्री इंद्रा गांधी की हत्या इनके जीवन में एक झटका लाती है।

वास्तव में यह कहानी और कोई नहीं बल्कि बोकारो शहर सुना रहा है । आपबीती ,कैसे एक खुशहाल शहर दंगाइयों की भेंट चढ़ता है। कौन नियंत्रित कर रहा है इस दंगे को।

कैसे एक समुदाय विशेष को टारगेट किया जा रहा है। कभी ना मिटने वाले ज़ख्मों के साथ कुछ  लोगों ने शरह को अलविदा कह दिया और पलट कर कभी नहीं देखा। कुछ ऐसे ही  कई ज़ख्म बोकारो के अंदर समाय है।

बार बार तो नहीं हा एक बार ज़रूर पढ़ा जा सकता है यह उपन्यास।



Sunday, 28 October 2018

पुस्तक समीक्षा






नाम: डार्क हॉर्स
लेखक: निलोत्पल मृणाल
मूल्य: ₹175
पब्लिकेशन: वेस्ट लैंड
डार्क हॉर्स लेखक का पहला उपन्यास है। यह साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार से पुरस्कृत कृति है। इसमें दिल्ली के अति चर्चित मुखर्जी नगर के छोटे छोटे किस्से बताएं गए हैं।
यह मुखर्जी नगर आईएएस अधिकारी बनने का सपना लेकर आए युवाओं की कहानी है। इसमें भाषा का स्तर सामान्य है।
लेखक ने आम बोलचाल की भाषा को ज्यों का त्यों प्रयोग किया है ।
यह पुस्तक बिहार के छोटे से गांव से आने वाले युवाओं की कहानी बताती है । इसमें दिल्ली जैसी जगह में कमरा खोजने से लेकर डब्बा वाला , पेपर वाला तक की कहानी है।जिसमें उन्हें जीवन के महत्वपूर्ण अनुभव भी हासिल होते हैं। कुछ खट्टे तो कुछ मीठे अनुभव। फैशन के साथ ही भाषा का भी ज्ञान । कई बेहतरीन डायलॉग भी हैं जैसे भाषा को लेकर एक है "अंग्रेज़ी व्यापार की भाषा है, उर्दू प्यार की और हिंदी व्यवहार की भाषा है।"
कुछ गुदगुदाता तो बहुत कुछ सिखाता है यह उपन्यास।
उपन्यास का नाम लेखक ने "डार्क हॉर्स"ही क्यों रखा यह भी बड़े अच्छे अंदाज़ में बताया गया है। उसे जानने के लिए उपन्यास को जरूर पढ़ें ।

Tuesday, 16 October 2018

अब तो खाने में भी टेक्नोलॉजी हो गर्ई हावी



विश्व खाद्य दिवस , 16 अक्टूबर को सन 1945 में फूड एंड एग्रीकल्चर आर्गेनाईजेशन ऑफ यूनाइटेड नेशंस की स्थापना हुई थी। इस दिन को याद करते हुए प्रति वर्ष दुनिया भर में वल्र्ड फूड डे के रूप में मनाया जाता है। दुनिया चाहें भोजन को  सिर्फ एक पोषक तत्व की तरह ही देखती हो ,पर हम भारतियों की भोजन से  आस्था जुड़ी है। हिन्दू शास्त्रों में भोजन को देवता माना गया है यानी अन्न देवता।
फाइल फोटो
आज आधुनिकता की इस दौड़ में हम हर चीज जल्दी पा लेना चाहतें है फिर वह चाहें नाम हो या पैसा। इस भाग दौड़ भरी जिन्दगी में इंसान इतना व्यस्त होता जा रहा है की उसे जीवन की सबसे जरूरी चीज भोजन की भी फिक्र नहीं रहती। मजेे की बात तो यह है की इस समय को भी लोग बचाना चाहतें है तभी तो अब जमाना इंस्टेंट फूड का आ गया है। इंस्टेंट फूड यानी जो जल्दी बन जाए,जैसे मैगी। सिर्फ इंस्टेंट फूड ही नहीं बल्कि टेक्नोलॉजी ने भी  खानें को आसान बना दिया है।
जहां एक ओर टेक्नोलॉजी ने हमारें जीवन को आसान कर दिया है तो वहीं इसने हमें आलसी भी बना दिया है। आज जब हम हर चीज एक क्लिक में पा लेते हैं तो ऐसे में भला भोजन कैसे पीछे रह सकता है। आज ना जानें कितने ही तरह के एप्स मौजूद हैं जिन पर मात्र एक क्लिक पर आप घर बैठे खाना मंगा सकतें हैं।




हर सिक्के के दो पहलू होतें है जहा समाज का एक तबका घर बैठे खाने का मजा ले रहा है वही दूसरा  तबका ऐसा भी है जिसे एक समय का खाना भी नसीब नहीं हो रहा है। हालात की गंभीरता को इसे भी समझा जा सकता है कि हमारें देश में पांच में से एक बच्चा कुपोषण का शिकार है। साल 2017 में आई इंटरनेशनल फूड पालिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार  भारत ग्लोबल हंगर इंडेक्स में 100 वें स्थान पर पहुच गया है। जबकि पिछली रिपोर्ट में यह रैंकिंग 97वें स्थान पर थी।

Sunday, 14 October 2018

हेप्टाथलन

हाल ही में एशियन गेम्स संपन्न हुए। जिसमें जीता हुआ हर मेडल अनमोल है क्योंकि अभावों में खिले इन सितारों की सालों की मेहनत रंग लाई है ।वह सिर्फ उनका नहीं बल्कि पूरे देश का गौरव है।
 इन्हीं एशियन गेम्स में पश्चिम बंगाल से आने वाली स्वप्ना बर्मन ने भी गोल्ड मेडल जीता है। जिस खेल में स्वप्ना ने गोल्ड मेडल जीता है उसका नाम है हेप्टाथलन

एथलेटिक्स में सबसे कठिन माना जाने वाला यह गेम सात खेलों का एक समूह है। जिसमें सभी साथ खेलों के अंक जोड़कर फाइनल प्वाइंट्स बनाए जाते हैं। 1980 से महिलाएं इसे खेल रही  हैं। इस   खेल को 2 दिन में पूरा किया जाता है जिसमें चार खेल पहले दिन तथा 3 गेम दूसरे दिन खेले जाते ।
इन खेलों का नाम है 100 मीटर हर्डल ,हाई जंप, शॉट पुट ,200 मीटर रेस , लॉन्ग जंप ,जेवलिन थ्रो ,800 मीटर रेस।जितना कठिन यह गेम है उससे भी ज्यादा कठिन है स्वप्ना का सफर ।अभावों में भी हार ना मानने वाली इस खिलाड़ी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि जज्बा संसाधनों का मोहताज नहीं होता।

Saturday, 13 October 2018

शोषण के खिलाफ एक जंग ,# Me Too


इन दिनों देश में जो एक मुद्दा चारो ओर छाया हुआ है वह है # Me Too। जिसकी शुरुआत तो 2006 में अमेरिकी सिविल राइट्स एक्टिविस्ट तराना बर्क ने की थी।इस के जरिए उन सभी महिलाओं को मौका मिला कि वो वर्क प्लेस पर हो रहें शारीरिक शोषण के खिलाफ अपनी आवाज उठाए।साल  2017 में यह मामला  एक बार फिर  उभरा  जब हॉलीवुड अभिनेत्री अलिस्सा मिलानो ने ट्विटर के जरिए डायरेक्टर हार्वी वाइंस्टीन के बारे में कुछ खुलासे किए। जिसके लिए वाइंस्टीन को कम्पनी छोड़नी पड़ी यहां तक उनका करियर भी बर्बाद हो गया।




भारत में इस कैंपेन की  शुरुवात  पूर्व अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर पर आरोप लगाते हुए की। जिसके बाद से ही पूरी इंडस्ट्री से ऐसे कई मामले सामने आने लगें है। अब ऐसे में एक बेहद अहम सवाल यह उठता है कि आखिर  किसे इस मी टू के अंदर रखा जाए या किसे नहीं? क्योंकि ऐसे भी कई मामले सामने आए जहां लोगों ने अपने निजी मतभेदों को मी टू साथ शेयर कर दिया। ऐसे में सभी को यह समझना होगा कि यौन उत्पीडन एक सभ्य समाज के लिए बहुत ही घटिया चीज है।तो इसमें सिर्फ और सिर्फ यौन उत्पीडन का ही ज़िक्र होना चाहिए। एक और सवाल जो उठ रहा है कि इतना वक्त क्यों लगा बोलने में? तो ऐसे में एक लड़की को बहुत हिम्मत चाहिए होती है।जो हर कोई नहीं जुटा पता या जब हिम्मत हुई तब बोला गया। अब सरकार ने भी बेहद अहम कदम उठाते हुए पूर्व जजों की एक कमिटी बाना दी है और हर एक केस की सुनवाई का भरोसा दिया है।