Saturday, 21 April 2018

जरदोजी


https://youtu.be/dQ3dCtaRZVY

जरदोजी का नाम फारसी से आया है जिसका अर्थ है सोने की कढ़ाई ।इसमें आज के समय में चांदी या सोने की पॉलिश वाले तारों का उपयोग होता है ।जरदोजी का काम भारत में ऋग्वेद के समय से प्रचलित है यह काम मुगल बादशाह अकबर के समय में और भी ज्यादा प्रचलित हुआ। लेकिन बाद में राज्य से संरक्षण और औद्योगिकरण के दौर में पतन होने लगा । अब यह कार्य भारत के लखनऊ , भोपाल और चेन्नई जैसे कई महानगरों में हो रहा है ।पुराने लखनऊ में यह काम आज भी लोग करते हैं अधिकतर लोगों ने इस काम की सीख अपने बड़े बूढ़ों से ली है ।आज के आधुनिक युग में जहां हर काम मशीनों द्वारा किया जा रहा है वहां आज भी शहर में कुछ ऐसे जरदोजी कारीगर मौजूद हैं जो कि घंटों बैठकर इसे पूरी लगन के साथ कर रहे हैं ।आइए जानते हैं कुछ ऐसे ही कारीगरों के बारे में ,मोहम्मद आजाद बताते हैं कि अब तो ज्यादातर कारीगरों ने अपना व्यवसाय बदल लिया है इतनी मंदी आ गई है  ।कहीं किसी ने परचून की दुकान कर ली तो किसी ने ई रिक्शा चलाना शुरु कर दिया है। आदिल अली बताते हैं कि शादियों के समय में काम अच्छा मिलता है तो कारीगरों की कमी रहती है।  उन्होंने यह भी बताया कि उन दिनों नफरी अच्छी निकल आती है। नफरी यानी 8 घंटे की मजदूरी ।जहां सहालग में नफरी  150 से ₹200 तक निकल आती है वहीं आम दिनों में यह घटकर 100 तक आ जाती है। जरदोजी के काम की मांग विदेशों में भी बहुत है इसकी सप्लाई दुबई में भी होती है वहीं सीरिया में जारी जंग ने जरदोजी निर्यात पर भारी असर डाला है।

Monday, 2 April 2018

लाडो

जीवन में हजार रंग होते हैं कभी खुशियां तो कभी गम साथ होते हैं । कुछ ऐसे ही रंगो और खुशी, गम को ख़ुद में समेटे हुए एक लड़की। वैसे तो बहुत नाम है उसके पर अक्सर कहती मुझे बुआ का दिया नाम लाडो ही अच्छा लगता है।

फाइल फोटो

अपने नाम की ही तरह है वह सब की लाडली पर कई बार अपने गर्म मिजाज के चलते मां से सुनना भी पड़ता है ।बचपन के किस्से हैं हजार पर जो कभी नहीं भूलती वह है प्ले स्कूल से किसी बच्चे का लंच बॉक्स उठा लाना ,सेंट मैरी स्कूल का पहला दिन और हां क्लास में मॉनिटर बन कर सब पर दादागिरी झाड़ना । ये दादागिरी भी तब खत्म हो गई जब एडमिशन दूसरे स्कूल में हुआ क्योंकि वहां तो दादा कोई और ही था ।बस ऐसे ही साल बीतते गए वह लड़की भी बड़ी होती गई और पीछे छूट गई वह सारी नादानियां वह शाम होते ही बाहर खेलने जाना, हर संडे ताई जी के घर जाने की जिद और चाचा के साथ दशहरे का मेला देखना ।हां वह हर रिश्तेदार का जाते-जाते पैसे देकर जाना और उसका यह कहना कि नहीं नहीं हम नहीं लेंगे ।

चुप सी संकोची और थोड़े गर्म मिजाज कि सिर्फ अजनबीयों के लिए ,वरना तो शरारती सी यह लड़की कई सपने बुन रही थी ।सपने भी ऐसे जो किसी सीरियल के एपिसोड की तरह बदल रहे थे कभी एयर होस्टेस तो कभी डॉक्टर ,हां बैंकर भी बनना चाहती थी कभी । जीवन में कुछ बन जाने की इच्छा को मन में लिए निरंतर बढ़ रही है। समस्याएं तो बहुत आई उसके जीवन में पर मां पापा के साथ और भरोसे ने कभी रुकने नहीं दिया। बस एक बात  जरूर सताती रहती  है कि कहीं यह भरोसा ना टूट जाए। जिंदगी की कहानी बड़ी लंबी है  पर आज बस यहीं तक।

Sunday, 1 April 2018

डिजिटल प्रहार

जी हां ,आज हमें अगर किसी से डरने की जरूरत है तो वह है इस आधुनिक प्रहार यानी डिजिटाइजेशन से ।आज जबकि हम बड़े ही आसानी से तरह तरह के ऐप्स अपने फोन में इंस्टॉल कर लेते हैं और जब वह एप्लीकेशन हमसे शेयर योर प्रोफाइल का ऑप्शन मांगता है तो हम तुरंत ओके पर क्लिक करते हैं ।हममें से शायद ही कोई सोचता है कि इसका भी कोई दुष्प्रभाव हो सकता है और इसी का फायदा उठाकर  फेसबुक जैसी बड़ी कंपनी ने अपने पांच करोड़ यूजर्स का डाटा बिना किसी पूर्व जानकारी के जमा किया। और यह डिजिटाइजेशन की ही तो देन है कि इतिहास में पहली बार सीबीएसई बोर्ड का एनुअल क्वेश्चन पेपर लीक हो गया और व्हाट्स एप पर हर किसी के पास आसानी से पहुंच गया । इसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हम सतर्क हैं आज जबकि पूरा देश राइट टू प्राइवेसी की मांग कर रहा है क्या हम खुद उस पर अमल कर पा रहे हैं ।हम खुद ही तो अपनी जानकारी फेसबुक जैसे सोशल साइट्स पर शेयर कर रहे हैं जिसका अगर कोई रिकॉर्ड रखे तो आसानी से हमारी प्राइवेसी भंग हो सकती है ।हम ही तो   फीलिंग लोनी को शेयर पचास आदर्श करके संतुष्ट हो जाते हैं । इसके दूरगामी दुष्प्रभाव के बारे में नहीं सोचते वह तो फेसबुक में डिलीट  पोस्ट का ऑप्शन दे रखा है पर हर सोशल नेटवर्किंग साइट पर यह ऑप्शन मौजूद नहीं है ।जहां एक ओर यह डिजिटाइजेशन हमारे जीवन को आसान बना रहा है वहीं दूसरी और यह एक घातक दंश भी दे रहा है। इससे बचने का उपाय मात्र सतर्कता और सावधानी है।

दर्पण

जब छोटे थे तब,
 बड़े होने की जल्दी थी ।
अब जब बड़े हो गए तो
वह मासूम बचपन याद आता है ।
याद आती है वह बारिश की मस्ती ,
वह लुका छुपी का खेल।
 वह फ्रिज का दरवाजा
धीरे से बंद करना ,
और यह सोचना कि
आखिर लाइट बंद कब होती है ।
याद आता है
वह हमारा मां के पास
 सोने के लिए झगड़ना ।
वह छोटे से घर में
जन्नत सा एहसास था।
 आज घर तो बड़ा है ,
पर वह एहसास  कहीं गुम है ।
खो गया है वह फिक्रमंद
सा बचपन कहीं।