https://youtu.be/dQ3dCtaRZVY
जरदोजी का नाम फारसी से आया है जिसका अर्थ है सोने की कढ़ाई ।इसमें आज के समय में चांदी या सोने की पॉलिश वाले तारों का उपयोग होता है ।जरदोजी का काम भारत में ऋग्वेद के समय से प्रचलित है यह काम मुगल बादशाह अकबर के समय में और भी ज्यादा प्रचलित हुआ। लेकिन बाद में राज्य से संरक्षण और औद्योगिकरण के दौर में पतन होने लगा । अब यह कार्य भारत के लखनऊ , भोपाल और चेन्नई जैसे कई महानगरों में हो रहा है ।पुराने लखनऊ में यह काम आज भी लोग करते हैं अधिकतर लोगों ने इस काम की सीख अपने बड़े बूढ़ों से ली है ।आज के आधुनिक युग में जहां हर काम मशीनों द्वारा किया जा रहा है वहां आज भी शहर में कुछ ऐसे जरदोजी कारीगर मौजूद हैं जो कि घंटों बैठकर इसे पूरी लगन के साथ कर रहे हैं ।आइए जानते हैं कुछ ऐसे ही कारीगरों के बारे में ,मोहम्मद आजाद बताते हैं कि अब तो ज्यादातर कारीगरों ने अपना व्यवसाय बदल लिया है इतनी मंदी आ गई है ।कहीं किसी ने परचून की दुकान कर ली तो किसी ने ई रिक्शा चलाना शुरु कर दिया है। आदिल अली बताते हैं कि शादियों के समय में काम अच्छा मिलता है तो कारीगरों की कमी रहती है। उन्होंने यह भी बताया कि उन दिनों नफरी अच्छी निकल आती है। नफरी यानी 8 घंटे की मजदूरी ।जहां सहालग में नफरी 150 से ₹200 तक निकल आती है वहीं आम दिनों में यह घटकर 100 तक आ जाती है। जरदोजी के काम की मांग विदेशों में भी बहुत है इसकी सप्लाई दुबई में भी होती है वहीं सीरिया में जारी जंग ने जरदोजी निर्यात पर भारी असर डाला है।
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