Sunday, 1 April 2018

दर्पण

जब छोटे थे तब,
 बड़े होने की जल्दी थी ।
अब जब बड़े हो गए तो
वह मासूम बचपन याद आता है ।
याद आती है वह बारिश की मस्ती ,
वह लुका छुपी का खेल।
 वह फ्रिज का दरवाजा
धीरे से बंद करना ,
और यह सोचना कि
आखिर लाइट बंद कब होती है ।
याद आता है
वह हमारा मां के पास
 सोने के लिए झगड़ना ।
वह छोटे से घर में
जन्नत सा एहसास था।
 आज घर तो बड़ा है ,
पर वह एहसास  कहीं गुम है ।
खो गया है वह फिक्रमंद
सा बचपन कहीं।

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