Monday, 2 April 2018

लाडो

जीवन में हजार रंग होते हैं कभी खुशियां तो कभी गम साथ होते हैं । कुछ ऐसे ही रंगो और खुशी, गम को ख़ुद में समेटे हुए एक लड़की। वैसे तो बहुत नाम है उसके पर अक्सर कहती मुझे बुआ का दिया नाम लाडो ही अच्छा लगता है।

फाइल फोटो

अपने नाम की ही तरह है वह सब की लाडली पर कई बार अपने गर्म मिजाज के चलते मां से सुनना भी पड़ता है ।बचपन के किस्से हैं हजार पर जो कभी नहीं भूलती वह है प्ले स्कूल से किसी बच्चे का लंच बॉक्स उठा लाना ,सेंट मैरी स्कूल का पहला दिन और हां क्लास में मॉनिटर बन कर सब पर दादागिरी झाड़ना । ये दादागिरी भी तब खत्म हो गई जब एडमिशन दूसरे स्कूल में हुआ क्योंकि वहां तो दादा कोई और ही था ।बस ऐसे ही साल बीतते गए वह लड़की भी बड़ी होती गई और पीछे छूट गई वह सारी नादानियां वह शाम होते ही बाहर खेलने जाना, हर संडे ताई जी के घर जाने की जिद और चाचा के साथ दशहरे का मेला देखना ।हां वह हर रिश्तेदार का जाते-जाते पैसे देकर जाना और उसका यह कहना कि नहीं नहीं हम नहीं लेंगे ।

चुप सी संकोची और थोड़े गर्म मिजाज कि सिर्फ अजनबीयों के लिए ,वरना तो शरारती सी यह लड़की कई सपने बुन रही थी ।सपने भी ऐसे जो किसी सीरियल के एपिसोड की तरह बदल रहे थे कभी एयर होस्टेस तो कभी डॉक्टर ,हां बैंकर भी बनना चाहती थी कभी । जीवन में कुछ बन जाने की इच्छा को मन में लिए निरंतर बढ़ रही है। समस्याएं तो बहुत आई उसके जीवन में पर मां पापा के साथ और भरोसे ने कभी रुकने नहीं दिया। बस एक बात  जरूर सताती रहती  है कि कहीं यह भरोसा ना टूट जाए। जिंदगी की कहानी बड़ी लंबी है  पर आज बस यहीं तक।

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