Saturday, 13 October 2018

शोषण के खिलाफ एक जंग ,# Me Too


इन दिनों देश में जो एक मुद्दा चारो ओर छाया हुआ है वह है # Me Too। जिसकी शुरुआत तो 2006 में अमेरिकी सिविल राइट्स एक्टिविस्ट तराना बर्क ने की थी।इस के जरिए उन सभी महिलाओं को मौका मिला कि वो वर्क प्लेस पर हो रहें शारीरिक शोषण के खिलाफ अपनी आवाज उठाए।साल  2017 में यह मामला  एक बार फिर  उभरा  जब हॉलीवुड अभिनेत्री अलिस्सा मिलानो ने ट्विटर के जरिए डायरेक्टर हार्वी वाइंस्टीन के बारे में कुछ खुलासे किए। जिसके लिए वाइंस्टीन को कम्पनी छोड़नी पड़ी यहां तक उनका करियर भी बर्बाद हो गया।




भारत में इस कैंपेन की  शुरुवात  पूर्व अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर पर आरोप लगाते हुए की। जिसके बाद से ही पूरी इंडस्ट्री से ऐसे कई मामले सामने आने लगें है। अब ऐसे में एक बेहद अहम सवाल यह उठता है कि आखिर  किसे इस मी टू के अंदर रखा जाए या किसे नहीं? क्योंकि ऐसे भी कई मामले सामने आए जहां लोगों ने अपने निजी मतभेदों को मी टू साथ शेयर कर दिया। ऐसे में सभी को यह समझना होगा कि यौन उत्पीडन एक सभ्य समाज के लिए बहुत ही घटिया चीज है।तो इसमें सिर्फ और सिर्फ यौन उत्पीडन का ही ज़िक्र होना चाहिए। एक और सवाल जो उठ रहा है कि इतना वक्त क्यों लगा बोलने में? तो ऐसे में एक लड़की को बहुत हिम्मत चाहिए होती है।जो हर कोई नहीं जुटा पता या जब हिम्मत हुई तब बोला गया। अब सरकार ने भी बेहद अहम कदम उठाते हुए पूर्व जजों की एक कमिटी बाना दी है और हर एक केस की सुनवाई का भरोसा दिया है।

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